A poem about time and circumstances…
औकात पर किसी का बस न था,और न ही चल सका था मेरा…रूह भी कांप गई थी उस पल,जब दिल सहम गया था मेरा…
फरयाद खुदा से कर रहे थे लब मेरे,कि उनकी जान बक्श दे ए-खुदा…खिदमत तेरी उम्र भर करूँगा,बस हर पल मुस्कान उसे दे ऐ खुदा…
रंजिशें कितनी झेली उसने,और मैं कुछ कर भी न सका…सिद्दतैं कितनी देखी उसने,मैं जरा दर्द सह भी न सका…
जान गया था उसके वजूद को मैं,कि मुझसे कहीं परे है वो…जान गया था लब्ज़ औकात के मैं,कि कितना हमदर्द है वो…
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